कोरोना संकट में रो पड़ना तो अक्षम्य है, रो तो देश रहा है

भारत के प्रधानमंत्री एक विभाजित व्यक्तित्व के स्वामी मालूम होते हैं। जान पड़ता है उनकी कल्पनाओं में वास्तविकता के भिन्न भिन्न संस्करण हैं, किन्तु सोशल नेटवर्किंग में निहित अपार संभावनाओं से भलीभांति वाकिफ होने और स्वयं फेसबुक-ट्विटर पर अत्यंत सक्रिय होने के बावजूद वो ये समझ नहीं पाते कि यूनिवर्सल एक्स्पोज़र के इस दौर में प्रेक्षक के मन में खण्डित चित्र नहीं बनता, वो व्यक्ति के नानारूपों को विश्लेषित कर उसकी एक कंपोजिट इमेज रचने में सक्षम होता है।

श्री नरेन्द्र मोदी को संसद में बोलते सुनिए, या किसी दुर्लभ एकांगी टीवी साक्षात्कार में, वो वहां यत्किंचित शालीनता से बोलते हैं, आवाज़ में ठहराव रहता है। सार्वजनिक सभाओं में उनके स्वर के आरोह-अवरोह किन्तु बदल जाते हैं। संसद की सौम्य छवि को निःशंक भाव से तिलांजलि दे दी जाती है। क्या प्रधान जी को यह लगता है कि टीवी पर संसद की कार्रवाई और चुनावी सभा देख रहे दर्शक भिन्न भिन्न हैं? वो ये ज़रूर सोचते हैं कि भिन्न ऑडिएंस को सम्बोधित करते समय मुझको भिन्न तेवर और हाव भाव अख़्तियार करना चाहिए किन्तु यह भूल जाते हैं कि इंटरनेट और टीवी पर देख रही ऑडिएंस सार्वभौमिक है। उसके सामने उनके इन दो रूपों को एक इमेज में प्रोसेस करने की चुनौती है!

अकसर अनुभव होता है कि प्रधानमंत्री अपने देशवासियों की बुद्धिमत्ता को कम करके आंकते हैं या कदाचित वो अपने विभाजित व्यक्तित्व के कारण इस द्वैधा को समझ नहीं पाते हों। नहीं तो यह कैसे सम्भव है कि महामारी के ऐन बीच में बंगाल में विशाल जनमैदिनी को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाने वाला व्यक्ति कुछ दिन बाद महामारी से ग्रस्त होने वालों को याद करके भावुक हो जाए, बशर्ते उनके मन में यह भावना हो कि बंगाल की सभा एक दूसरी वास्तविकता थी और महामारी से मरने वाले एक दूसरी दुनिया के वासी हैं? यह एक विखंडित चेतना का परिचायक है। या देशवासियों के स्मृतिलोप को उन्होंने कुछ ज़्यादा ही आंक लिया है? यह सच है कि कालान्तर में लोग भूल जाते हैं किन्तु इतनी जल्दी तो कोई कुछ नहीं भूलता। प्रधान जी के रुदन में भी वही विरोधाभास है। वो भूल जाते हैं कि उनका चयन एक कुशल प्रशासक, इच्छाशक्ति से भरे नेता और निर्णयशीलता के गुण के कारण किया गया था, भावुक और कोमल हृदय के स्वामी होने के कारण नहीं। क्या वो इस बात को जानते हैं कि वैसा करके वो अपने ही द्वारा परिश्रमपूर्वक रची छवि को निरस्त कर रहे होते हैं?

मोदी जी के रुदन का इतिहास भी रोचक है। 2014 में ऐतिहासिक राज्याभिषेक के तुरन्त बाद संसद में उनका गला रूंध गया था। वो विजय का क्षण था और राजा की भावुकता को उसका अलंकार ही माना गया। किन्तु बाद उसके अनुचित अवसरों पर रो पड़ने की आदत उन्होंने विकसित की। कह सकते हैं कि नोटबंदी और दलित छात्र की आत्महत्या के बाद वो आत्मरक्षा में रोए किन्तु फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग से बात करते समय और गुलाम नबी आज़ाद की विदाई पर फूट पड़ने की तो कोई तुक ही नहीं थी। और कोरोना संकट में रो पड़ना तो अक्षम्य है। रो तो देश रहा है।सच ये है कि मोदी जी को जितना समर्थन देश की जनता ने दिया है, उतना कम को ही दिया होगा। दो बार बहुमत दिया, अनेक राज्यों के चुनाव बिना किसी मुख्यमंत्री के चेहरे के जिताए। लोगों ने नोटबंदी को सहा, क्योंकि उन्होंने देखा कि इसके पीछे की मंशा नेक थी, फिर भले बात ठीक से ना बनी हो। मोदी जी ने गए साल लॉकडाउन लगाया तो लोगों ने हज़ारों कष्ट सहे, घरों में क़ैद रहे, लेकिन सबसे ये कहा कि देखो, हमारा नेता ज़िम्मेदार है, उसने त्वरित निर्णय लिया, नहीं तो इटली-अमरीका की तरह हमारे यहाँ भी लाशें बिछ जातीं। इस आदमी से चंद लोगों ने बहुत नफ़रत की, लेकिन करोड़ों लोगों- (जिनमें सभी ‘भक्त’ नहीं हैं)- ने बेशुमार प्यार और समर्थन दिया। क्योंकि मन में भावना सभी के यही, कि माना यह बहुत परिष्कृत, बहुत सुशिक्षित नेता नहीं और इनकी कुछ बातें बहुतों को पसंद नहीं, फिर भी कम से कम इतना तो है कि इनका रात-दिन देश के लिए समर्पित है, ये राष्ट्रधर्म सर्वोपरि मानने वाले स्वयंसेवक हैं।

किन्तु कोरोना की दूसरी संहारक लहर के सामने वो हतप्रभ और संज्ञाशून्य दिखाई दे रहे हैं। मालूम होता है जैसे कथानक के सूत्र उनके हाथ से छूट रहे हैं। उनके समर्थकों के लिए तो यह दुविधा की स्थिति है ही, देश में स्थायित्व और निर्णायक शासन की चाह रखने वालों के लिए भी यह त्रासद है। अनेक तटस्थों का मत था कि विभेदकारी और भारतविरोधी वाम-विचार के समक्ष मोदी जी ढाल बनके खड़े हैं किन्तु अब वो निरुपाय हुए जाते हैं। कोरोना काल की एक त्रासदी यह भी है कि वाम-इस्लाम गठजोड़ को इसने नैरेटिव की सवारी करने की मोहलत दे दी है। राष्ट्रीय स्वर ने आत्मविश्वास खोया है।

भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों में कट्टरपंथी तबके को अब योगी आदित्यनाथ अधिक सुहाने लगे हैं वहीं मध्यवर्ग को नितिन गडकरी अधिक संभावनाशील लगने लगे हैं। क्या भारतीय जनता पार्टी 2024 के चुनाव में मोदी जी के नेतृत्व में ठीक वैसे ही मैदान में उतरेगी जैसे 2009 में आडवाणी जी की सरपरस्ती में उतरी थी, अपने नेता के प्रति दुविधा और अविश्वास के साथ? अगर हां, तो क्या मोदी जी के विकल्प के रूप में देश के सामने किसी और चेहरे को रखने की तैयारी भाजपा-संघ के संगठन में शुरू होने जा रही है?

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