आंखों पर चढ़े चश्‍मों का क्‍या किया जाए !

पिछले बरस मैंने एक वीडियो बनाया था. जिसमें मैंने भारतीय स्‍कूलों की शिक्षा में प्रभावी हिन्‍दुत्‍व-एजेण्‍डे की बात कही थी. उस वीडियो को लेकर स्‍थानीय लोगों द्वारा कड़ी प्रतिक्रिया हुई. मुझ पर हमला करने की कोशिश की. हालांकि वो अपनी करतूत में सफल नहीं हो पाए. किन्‍तु हम उनके इस कृत्य के पीछे की मानसिकता को समझ सकते हैं. कि वो आख़िर इतने विचलित क्‍यों हो जाते हैं.

मैंने उस में वीडियो सिर्फ़ यही कहा था कि ख़ासकर उतर भारत के राजकीय एवं निजी विद्यालयों में सुबह-सुबह प्रार्थनाएं होती हैं. उन तमाम प्रार्थनाओं में लगभग मां सरस्‍वती की ही स्‍तुति होती है. और हम जानते हैं कि मां सरस्‍वती एक ख़ास धर्म की देवी है. किन्‍तु उन प्रार्थना सभाओं में हर धर्म विशेष के बच्‍चे हो सकते हैं. वो मां सरस्‍वती की स्‍तुति गाने के लिए मज़बूर क्‍यों हैं? जबकि सुंदरता यह है कि उन प्रार्थनाओं को हर धर्म के बच्‍चे बड़े स्‍नेह से गाते हैं. बड़ी सहजता से बरसों से गा रहे हैं. उनकी कोई शिकायत नहीं रही. अब एक सवाल? क्‍या हिन्‍दुओं के बच्‍चे भी सहजता से मुस्‍लिम, सिख या ईसाई प्रार्थनाएं गा सकते हैं? मैंने इसी विषय पर अपनी बात कही थी. जिसका भारी विरोध हुआ.

इस संबंध में विरोधियों का तर्क था कि मैं मदरसों के बारे में क्‍यों नहीं कुछ बोलता? वहां हिन्‍दू प्रार्थनाएं करवाकर दिखा दो! जैसे कि देश के स्‍कूल हिन्‍दू स्‍कूल हों. हां, इनकी ग़लती नहीं. व्‍यावहारिक रूप से ऐसा ही प्रतीत होता है. किन्‍तु इस एकरूपता का ही तो प्रश्‍न है कि यह स्‍वभाविक क्‍यों होता जा रहा है? हमें समझना चाहिए कि देश के स्‍कूल मदरसों के समकक्ष नहीं हैं. ये संस्‍थाएं शैक्षणिक संस्‍थाओं से भिन्‍न हैं. यदि आप मदरसों की बात करते हैं तो आपको वेदशालाओं एवं गुरूकुलों की बात करनी चाहिए. मदरसों के जो समकक्ष हैं.

मेरा मानना है कि स्‍कूली शिक्षा इस देश के संविधान से संकल्‍पित होती है. और हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्ष मूल्‍यों एवं हर धारा का बराबर सम्‍मान है. इसलिए पाठ्यक्रम एवं स्‍कूली गतिविधियों में हर धर्म का समान प्रतिनिधित्‍व होना चाहिए. हालांकि मुसलमानों, सिखों एवं दलित-आदिवासियों का आनुपातिक प्रतिनिधित्‍व भी न के बराबर है. सामाजिक दृष्‍टि से यह स्‍वभाव ही बना दिया गया है कि सबकुछ ‘हिन्‍दू’ ही है, उसे ही स्‍वीकार करने के लिए बाध्‍य हैं. जो कि ठीक नहीं है.

यह अलग विषय है कि स्‍कूलों में प्रार्थनाएं होनी चाहिए या नहीं. इस पर मत मेरा अलग हो सकता है. जो प्रार्थनाएं बच्‍चों को दयनीय एवं निर्बल बनाए उन्‍हें बंद ही हो जाना चाहिए. लेकिन मैं स्‍कूलों में सांस्‍कृतिक सभाओं के तो पक्ष में हूं. लेकिन बात है कि जब प्रार्थनाएं हो रही हैं तो फिर ऐसा क्‍यों हैं?

मैंने जो चिंता ज़ाहिर की वो दरअसल इन दिनों सही साबित हो गई. ख़बर है कि यूपी के पीलीभीत में एक प्रधानाचार्य को इसलिए निलम्‍बित कर दिया गया क्‍योंकि उसने स्‍कूल में अलामा इक़बाल की ‘प्रार्थना’ करवा दी. वो ही इक़बाल जिन्‍होंने ‘सारे जहां से हिन्‍दोस्‍तां’ लिखा था. इस बाबत शिकायत की थी विश्‍व हिन्‍दू परिषद के लोगों ने. हमें इस पर तो कोई आश्‍चर्य नहीं होनी चाहिए कि कि यह शिकायत वीएचपी ने की. उनकी बुनियादी इसी पर टिकी हैं. लेकिन हैरानी तब हुई जब अधिकारियों ने उस प्रधानाचार्य को निलम्‍बित कर दिया.

इससे समझ आता है कि नफ़रत का विस्‍तार कहां तक है और कुपढ़ कहां-कहां बैठे हैं. सभी पर एक ही रंग चढ़ा है. उर्दू लफ़्ज़ ही इन्‍हें साम्‍प्रदायिक प्रतीत होता है. यह ज़हमत ही नहीं उठाते कि आख़िर जो प्रार्थना बोली गई उसका अर्थ क्‍या है. मुसलमानों जैसी प्रतीत हो रही है, ज़ाहिर है मदरसे की होगी. और हो गया अपराध.
बरसों से स्‍कूलों को ‘सरस्‍वती-मंदिर’ कह रहे हो तो भी साम्‍प्रदायिक नहीं हुआ लेकिन एक प्रार्थना ऐसी क्‍या बोल दी, जिसका इस्‍लाम से कोई वास्‍ता भी नहीं, प्रधानाचार्य को ही निलम्‍बित कर दिया.

आपने भी अल्‍लामा इक़बाल की प्रार्थना नहीं पढ़ी या सुनी तो यह रही –

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
ज़िंदगी शम्अ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी

 

दूर दुनिया का मिरे दम से अंधेरा हो जाए!
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!

 

हो मिरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

 

ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब
इल्म की शम्अ से हो मुझको मोहब्बत या-रब

 

हो मिरा काम गरीबों की हिमायत करना
दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना

 

मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझको!।

इस दुआ की वज़ह से बताइए कहां से साम्‍प्रदायिकरण हो रहा है. यदि इसका निहितार्थ समझा जाए तो हर कोई सराहे. पर आंखों पर चढ़े चश्‍मों का क्‍या किया जाए, जिसका शायद कोई इलाज़ नहीं.

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