विवाह एक सांस्थानिक वेश्यावृत्ति है !

मेरे इस आप्तवाक्य पर उससे कहीं अधिक उपद्रव हो चुका है, जितना कि होना चाहिए! मालूम होता है कि फ़ेसबुक मित्र इस एक कथन से ऑब्सेस्ड हो चुके हैं। इस वितंडा में बहुत कुछ प्रायोजित है, इसके बावजूद इस कथन की व्याख्या को अब उद्यत होता हूँ! अस्तु!

अव्वल तो यही कि यह एक स्वतंत्र वाक्य नहीं था। यह एक परिप्रेक्ष्य में कहा गया था। वह परिप्रेक्ष्य है-

“विवाह और वेश्यावृत्ति को पुरुष ने इसलिए रचा है, क्योंकि उसे स्त्री तो चाहिए, किंतु प्रेम के बिना चाहिए। प्रेम से वह भयभीत है।”

यों देखा जाए तो वेश्यावृत्ति भी एक क़िस्म का संस्थानीकरण है। वह एक विनिमय तंत्र है, जिसमें यौनेच्छा का नियमन किया जाता है। किंतु वह लोकसम्मत नहीं है। लोक जो है, वह नैतिकता के अपने ही निजी भ्रम रचता है।

इसलिए उसने एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में विवाह रचा, जिसमें यौनेच्छा (किसी को भी भ्रम नहीं होना चाहिए कि यौनेच्छा की तुष्टि ही विवाह के मूल में है) के निर्वाह के साथ ही संतानोत्पत्ति, कुटुम्ब निर्माण, समाज की इकाई के रूप में परिवार के स्वरूप का निर्धारण आदि प्रयोजन होते हैं।

समाज इन्हें पवित्र प्रयोजन मानता है, मैं इसे केवल एक उपयोगी व्यवस्था मानता हूं।

सनद रहे, विवाह के लिए प्रेम अनिवार्य नहीं है।

विवाह के मूल में अगर प्रेम है तो अच्छी बात है, किंतु प्रेम ही होना चाहिए, इसका कोई मानदंड समाज ने तय नहीं किया है। जाति, गोत्र, गुण दोष के मानदंड हैं, एक प्रेम का ही नहीं है!

और बिना प्रेम के यौनाचार क्या कहलाता है?

केवल संस्थानीकरण से क्या होता है? विवाह एक व्यवस्था है। व्यवस्था उपयोगी होती है। किंतु जो भी उपयोगी है, वह नैतिक हो, सुंदर हो, सत्य हो, यह आवश्यक नहीं।

इसका दूसरा पहलू यह है कि प्रकृति ने यौनेच्छा को संतानोत्पत्ति के उपकरण के रूप में रचा, मनुष्य ने उसमें प्रेम और सुख के प्रतिमान जोड़ दिए। प्रकृति ने एकनिष्ठा की भी कोई बाध्यता नहीं रखी थी। संतानोत्पादन पर कोई नियंत्रण भी नहीं रखा था। मनुष्य ने समाज के भीतर आने के बाद ये सभी नियम रचे। संसर्ग के लिए प्रेम हो, यह भी आवश्यक नहीं है। किंतु संसर्ग के लिए प्रेम हो, यह सौंदर्यशास्त्रीय नैतिकता के अनुकूल अवश्य है। और जैसा कि मैंने अपनी हाल ही की पोस्ट में यह स्पष्ट किया था, सभ्य मनुष्य के लिए निरी नैतिकता पर्याप्त नहीं है, उसमें सौंदर्यशास्त्रीय नैतिकता का निर्वाह भी आवश्यक है।

विवाह यौनेच्छा का संस्थानीकरण करता है, क्योंकि मनुष्यता के लाखों वर्षों के इतिहास के बावजूद मनुष्य आज तक अपनी यौनेच्छा के प्रति सहज नहीं हो पाया है। उसे वह स्वीकार नहीं कर पाया।

बड़ी विचित्र बात है कि विवाह-पूर्व यौनेच्छा निषिद्ध है। विवाहेतर यौनेच्छा भी निषिद्ध है। उसे व्यभिचार कहकर लांछन लगाया जाता है, पाप कहा जाता है, पतनशीलता कहा जाता है, चरित्रहीनता बतलाया जाता है। किंतु विवाह नामक संस्था के भीतर उसे धर्म, दायित्व, नीति, रीति, नियम स्वीकार लिया जाता है!

यह द्वैधा मनुष्य के भीतर कहां से आई है? प्रकृति ने तो नहीं रची। और समाज-व्यवस्था के प्रति निष्ठा ही इसके मूल में हो, वैसा भी नहीं है। विवाह नामक संस्था का एक प्रयोजन यौनेच्छा के नियमन के साथ ही स्त्री-यौनेच्छा का प्रबंधन भी है। स्त्री की मर्यादाएं विवाह में निश्चित की जाती हैं।

आश्चर्य नहीं है कि विवाह नामक संस्था पर प्रश्न करने भर से पुरुषसत्ता के द्वारा संचालित संरचनाएं बौखला उठती हैं, और जैसा कि मैं बार-बार दोहराता हूं, धर्म पुरुषसत्ता के अपराधों में सहभागी है, इसलिए प्रकारांतर से धर्म भी इसे अपने अस्तित्व पर प्रहार स्वीकार कर लेता है।

बड़े मज़े की बात है कि मैंने विवाह को सांस्थानिक वेश्यावृत्ति कहा और इसे धार्मिक आस्था पर प्रहार की तरह देखा गया। धार्मिक आस्था पर प्रहार? और उसमें भी विशेषकर हिंदू आस्था? वो कैसे?

विवाह तो वैश्विक परिघटना है, फिर केवल हिंदुओं को ही इस पर प्रश्न पूछने से आपत्ति क्यों हुई?

जब आप इन प्रश्नों के भीतर उतरते हैं तो पुरुषसत्ता, यौनकुंठा, लोकरीति में कर्मकांडों का प्राधान्य, प्रभावशाली वर्णों का वर्चस्व और धर्म के मनुष्यद्रोही स्वरूप के आयाम, ये सभी परतें एक-एक कर खुलने लगेंगी।

एक मां अपनी बेटी को जीवनभर निर्देश देती रहती है-

-दुपट्‌टा सम्भाल
-सिर ढांक
-बाल बांध
-हंसकर बात मत कर
-छत पर मत जा
-जल्दी घर लौट आ
-लड़कों से मत घुल-मिल
-नज़र झुकाकर निकल!

माएं अपनी बेटियों की यौनेच्छा से भयभीत होती हैं।

फिर एक दिन यही मांएं विवाह के नाम पर अपनी बेटियों को सजा-संवारकर एक अपरिचित पुरुष के कक्ष में छोड़ आती हैं।

किस चीज़ के लिए?

-समाज के लिए?
-परिवार के लिए?
-धर्म के लिए?
-मर्यादा के लिए?

या फिर पुरुष की यौनेच्छा की तुष्टि के लिए, एक वस्तु की तरह?

उस एक चीज़ के लिए, जो अभी तक निषिद्ध थी, और अभी सहसा पवित्र दायित्व बन गई है?

इसे अगर मैं वेश्यावृत्ति का संस्थानीकरण कहूं तो आपको आपत्ति क्यों होनी चाहिए?

वैसे अवसर पर बेटियां अगर अपनी मां की आंखों में झांककर देख लें कि “मां, क्या ये तुम्हीं हो”, तो क्या ये मांएं लज्जित नहीं हो जाएंगी?

पुत्री के कौमार्य की विवाह तक रक्षा — भारतभूमि की मांएं इस एक बात से आविष्ट हो चुकी हैं, यह कोई कपोल-कल्पना नहीं, घर-घर की सच्चाई है।

प्रेम के बिना, एक सामाजिक अनुबंध के तहत, अपरिचित पुरुष के साथ बलात् संसर्ग अगर वेश्यावृत्ति नहीं है तो और क्या है?

आप लाख उस पर आरोपित मूल्यों का मुलम्मा चढ़ाकर उसे महान बतलाने की कोशिश करें, उससे सत्य थोड़े ना बदल जाता है।

मंत्रोच्चार से वैवाहिक बलात्कार थोड़े ना बदल जाता है।

धर्म के नाम पर मनुष्य का शोषण वैध थोड़े ना हो जाता है।

स्त्री के दमन को मान्यता थोड़े ना मिल जाती है।

अब चूंकि संसार में कुछ भी एब्सोल्यूट नहीं होता, इसलिए विवाह नामक संस्था को भी अनेक दृष्टियों से देखा ही जा सकता है। वैसा भी नहीं है कि विवाह करने वाले सभी स्त्री-पुरुष सुखी नहीं हैं, संतुष्ट नहीं हैं, या प्रेम विवाह की सफलता का प्रतिशत समाज द्वारा निर्धारित विवाह की तुलना में अधिक है। चीज़ों के अनेक पहलू होते हैं और बुद्धिमत्ता का दायित्व चीज़ों की बहुस्तरीयता का उद्घाटन करना ही होता है।

कोई वाक्य, चाहे वह आप्तवाक्य ही क्यों ना हो, किस परिप्रेक्ष्य में कहा जा रहा है, इसका भी आलोकन करना होता है।

कोई व्यक्ति किसी विषय पर अगर सुचिंतित रूप से अपनी राय रखता है तो इसको स्वीकार करना होता है, या उसका प्रतिकार करना हो तो उसे वांछनीय भाषाई मर्यादा से ही करना होता है।

अपशब्दों से तो बौद्धिक और सांस्कृतिक विपन्नता ही ज़ाहिर होती है।

वैसे भी, इस प्रसंग से पहले ही मुझको मालूम था कि भारतदेश के वासी बौद्धिक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप से कंगाल हो चुके हैं और स्वयं को विश्वगुरु बतलाकर उस अभाव से उपजी कुंठा का शमन करते हैं, तो इस प्रसंग से कोई नई बात मुझको तो मालूम नहीं हुई।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने चुटकी लेने के अंदाज़ में ही कहा था कि “विवाह इसलिए लोकप्रिय है, क्योंकि वह अधिकतम लोभ का अधिकतम अवसर से मेल कराता है।”

ग़नीमत है कि शॉ भारतदेश का वासी नहीं था, अन्यथा व्यवस्था के दोष को व्यक्ति पर आक्षेप मानकर उसे कहा जाता-

“विवाह को लोभ बतलाने वाले तुम लोभी, तुम्हारी माता लोभी, तुम्हारे पिता लोभी, तुम्हारा समस्त कुटुम्ब लोभी!”

तिस पर अगर शॉ ज़ोरदार ठहाका लगा बैठता तो इसके लिए आपको उसे दोष नहीं देना चाहिए।

क्या आप सुन पा रहे हैं ठीक वैसा ही एक ठहाका, इस लेख के समाप्त हो जाने पर, हिंदू राष्ट्रवादियो?

सुशोभित सक्‍तावत

  • (स्वतंत्र लेखक)

स्पष्टीकरण: कुमार श्‍याम डॉट इन हर पक्ष के विचारों और नज़रिए को अपने यहां समाहित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह आवश्‍यक नहीं है कि हम यहां प्रकाशित सभी विचारों से सहमत भी हों। लेकिन ऐसे स्वतंत्र लेखक और स्तंभकार जो कुमार श्‍याम डॉट इन पर लिखते हैं, हम उनके विचारों को मंच देते हैं लेकिन ज़वाबदेह नहीं हैं।

4 Comments

  • Niraj says:

    Kya bakwas lekh hai.. Vivah isliye tha ki aurat ka pet bhara ja sake.. aur kaumarya wala option nahi tha bacche ho jaate the condoms nahi the. Gawar bane raho aur sirf chatukarita hi karo logic se koi naata nahi tumhara.

  • स्वाति says:

    प्रेम-रहित विवाह पुरुष के लिए बलात्कार और स्त्री के लिए वैश्यावृत्ति के समकक्ष है. वे माता-पिता जो यह तय करते हैं की उनके बेटे/ बेटी को किसके साथ सोना है, बेशर्मी की हद करते हैं. और उनके बच्चे (बेटा हो या बेटी) जब इस प्रकार एक अनजान व्यक्ति के साथ शयन करने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो वे अपनी चरित्रहीनता ही का प्रमाण देते हैं.

  • मैं भी विवाह संस्था का विरोधी हूँ।

  • Anurag says:

    Dude, I think you are one of the best few humans on Earth right now. Maximum assault with your words covering every aspect of hypocrisy and madness of society and fundamentalists.

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