लव जिहाद : मिथ्यावरण या सच्चाई?

लव जिहाद के बारे में अधिक नहीं लिखूंगा. इस विषय पर एक विस्तृत एपिसोड कर चुका हूं. यूट्यूब पर देखा जा सकता है. लेकिन भाजपा शासित राज्यों में ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए लाए जा रहे क़ानूनों के बाद फिर यह जिन्न बोतल से निकल चुका है. लव जिहाद पर नए सिरे से चर्चाएं हो रही हैं. दरअसल यूपी सरकार ने ड्राफ़्ट तैयार कर लिया है जिसमें लव जिहाद का कहीं ज़िक्र नहीं है. इसे गैर क़ानूनी धर्मांतरण निरोधक बिल कहा जा रहा है. ऐसे मामले में दोषी पाए जाने पर 5 से 10 साल की सज़ा का प्रावधान किया जा सकता है. ऐसा ही क़ानून मध्यप्रदेश की सरकार लेकर आ रही है. उसके बाद राजनीतिक टीका-टिप्पणियां हो रही हैं.
 
वैसे ख़ुद भाजपा सरकार ने इस धारणा को ख़ारिज किया है. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने लोकसभा में बताया कि ‘लव जिहाद’ शब्द मौजूदा क़ानूनों के तहत परिभाषित नहीं है. संविधान का अनुच्छेद 25 किसी भी धर्म को स्वीकारने, उस पर अमल करने और उसका प्रचार-प्रसार करने की आज़ादी देता है. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अंतरधार्मिक एवं अंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा मिलना चाहिए, यह समाज के हित में हैं. एक अन्य मामले में केरल हाईकोर्ट ने भी लव जिहाद जैसी चीज़ को ख़ारिज किया है.
 
2005-06 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े के मुताबिक़ भारत में होने वाली कुल शादियों में सिर्फ 10 फ़ीसदी शादियां ही अंतरजातीय होती हैं. वहीं अंतरधार्मिक विवाह सिर्फ 2.1 फ़ीसदी ही होते हैं. भारत में 95 फ़ीसद शादियां जाति देखकर की जाती हैं. ऐसी स्थिति के बावज़ूद हिन्दू-मुस्लिम विवाह को लव जिहाद की संज्ञा देकर राजनीतिक माहौल बनाना और उससे संबंधित क़ानून लेकर आना क्या दर्शाता है? जबकि कौनसा विवाह वैध है और कौनसा नहीं? इससे संबंधित क़ानून-क़ायदे पहले से हैं.
 
इस देश में अपने जीवनसाथी के चयन और गरीमामयी जीवन जीने का अधिकार हर नागरिक को है. उस पर निशानदेही करना और उनके रिश्ते को सामाजिक रूप से सशंकित दृष्टि से देखना प्रतिगामी तो है ही, साथ ही नागरिक अधिकारों का उल्लंघन भी है.
 
लव जिहाद के पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण धारणा काम करती है वो यह है कि हिन्दू महिला से मुस्लिम पुरुष शादी करता है और विवाह के बाद हिन्दू महिला की धार्मिक मान्यताओं का संरक्षण नहीं किया जाता बल्कि उसे पति की धार्मिक पहचान को ओढ़ना पड़ता है. हालांकि पति उस पर दबाव नहीं भी बनाता होगा लेकिन पारिवारिक एवं भावनात्मक पक्षों से अंतत: महिला को विवश होना ही पड़ता है. ऐसा करने के लिए पितृसत्तात्मक दबाव तो है ही.
 
तो कैसे पहचाना जाए कि लव जिहाद के नाम से चल रही धारणा वास्तव में है या यूं ही कुछ लोगों की राजनीतिक शरारत है?
 
मेरे ख़्याल से एक तरीक़ा हो सकता है. वो यह है कि उन शादियों का मूल्यांकन किया जाए जो हिन्दू-मुस्लिम के बीच हुई है और कितने प्रतिशत ऐसी हिन्दू महिलाएं हैं जिन्होंने मुस्लिम धर्म अपना लिया और कितने प्रतिशत मुसलमान पुरुष हैं जो पत्नी का धर्म यानी हिन्दू होना स्वीकार कर लिया? और एक तथ्य यह भी परखा जा सकता है कि कितने प्रतिशत जोड़ों ने अपने प्रेम को ही सबकुछ माना और अपनी-अपनी संस्कृति और मान्यताओं को निबाहते रहे? यही तथ्य उस स्थिति में भी जांचा जा सकता है जहां पुरुष हिन्दू हाे और महिला मुस्लिम.
 
यदि तथ्य समानपूर्वक उभरकर आता है तो कोई दिक्कत नहीं. सब ठीक है. लव जिहाद नाम की धारणा ही निराधार होगी. यदि आंकड़ें इस मान्यता के अनुरूप ही आते हैं तो कहा जा सकता है कि इस चिंतन किया जाना चाहिए. जब प्रेम ही रिश्ते का आधार हो तो फिर बाजी धर्म पर आकर कैसे अटक जाती है? इस पर सजग विवेक से नीर-क्षीर विवेचन करना ही चाहिए.
 
बाक़ी मैंने लव जिहाद पर विस्तृत वीडियो बनाया है. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा की है, इस लिंक पर जाकर देख सकते हैं-
 

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