दलित-मूलवासियों की निशानियों की पुनर्स्थापना कब होगी?

अब मथुरा-काशी बाकी है?

श्रीरामजन्‍मभूमि पूजन के बाद यह बात उभर रही है कि अब मथुरा-काशी की बारी है? इसका आशय है कि यहां भी जिन मंदिरों को तोड़कर मस्‍जिद बनाई गई है, उनकी ज़गह मंदिरों की पुनर्स्‍थापन हो!

बाबरी ध्‍वंस एक आपराधिक कृत्‍य था। यह उच्‍चतम न्‍यायालय ने भी माना है। आरोपियों पर मुक़दमा चल रहा है। निर्णय लम्‍बित है। लेकिन देश में ज़िंदा संसद एवं न्‍यायालय के रहते उस इमारत काे गिराया गया। क्‍या इस कलंक से मुक्‍ति संभव है?

यहां एक प्रश्‍न अहम है कि किसी आक्रांता द्वारा किसी धर्मस्‍थल को नष्‍ट करना और उस कृत्‍य का बदला अब लेना, क्‍या यह एक समान बात है? सन् 47 के बाद हम जिस लोकतांत्रिक मुल्‍क के रूप में अस्‍तित्‍व में आए हैं, उसमें मध्‍यकालीन अनुचित कृत्‍यों को दोहराना ठीक है? मेरे हिसाब से नहीं। यदि ठीक है तो इस लोकतांत्रिक व्‍यवस्था की संस्‍थाओं पर ताला लगा दें। और यह घोषणा कर दी जाए कि जिसमें बल और सामर्थ्‍य है, वह कुछ भी कर सकता है।

श्रीरामजन्‍मभूमि के संबंध में जो हुआ, वो इतिहास है। लेकिन इससे आगे भी कदम बढ़ाने की बातें हैं। मथुरा-काशी बाकी है। इसे हिन्‍दू अस्‍मिता का प्रश्‍न बताया जा रहा है। लहज़ा कहता है कि यदि ऐसा हुआ तो बुरा नहीं होगा।

लेकिन यहां दलित-आदिवासी-अस्‍मिता को भूला दिया जाता है? आख़िर क्‍यों?

यदि इतिहास का यही हिसाब होना है कि अतीत में जो बुरा हुआ, चाहे वो हजारों साल पहले हुआ हो, उसे सुधारा जा सकता है। उसकी कीमत भले ही गंभीर सामाजिक वैमनस्‍य के रूप में चुकानी पड़े तो क्‍यों नहीं मूलनिवासियों को अपनी निशानियों को पुनर्जीवित करने के लिए आवाज़ उठानी चाहिए? यह तो है नहीं कि कुछ ही अस्‍मिताओं का महत्‍व है? इतिहास में ऐसी बहुत-सी अस्‍मिताएं हैं जिन्‍हे बड़े ही निर्मम तरीक़े से रौंदा गया है। तो क्‍यों नहीं वो अपनी अस्‍मिता का प्रश्‍न उठाए और अपने सांस्‍कृतिक महत्‍व के प्रतीकों को प्राप्‍त करें?

सबसे बड़ी गले की फांस है सिन्‍धुघाटी-सभ्‍यता।

अत्‍यंत परिपक्‍व, सुसंगत और शालीन सभ्‍यता अचानक से लुप्‍त हो गई और उसके स्‍थान पर एकदम नई सभ्‍यता उभरती नज़र आई। उसे वैदिक-सभ्‍यता कहते हैं। सिन्‍धुघाटी सभ्‍यता कैसे समाप्‍त हो गई? शूद्र-अतिशूद्र कैसे बन गए? निश्‍चित ही तलवार के बल पर।

अब आज के इतिहास-बोध पर आएं। मुग़लों ने जिन धर्मस्‍थलों को उजाड़ा, उनके स्‍थान पर पुन: धर्मस्‍थलों को बहाल किया जाए। ठीक है कीजिए बहाल। लेकिन अब थोड़ा और पीछे चलें। जब रीर्वस गियर लगा ही लिया है ताे और पीछे चलें। अपनी ही महत्‍व की चीज़ों पर क्‍यों रुकें? आर्यों ने जो उजाड़ा, जिस सभ्‍यता-संस्‍कृति को नष्‍ट किया, उसे बहाल किया जाए? दलित-आदिवासियों को उन तमाम इमारतों, धर्मस्‍थलों एवं राजमहलों पर हमला करना चाहिए, दिन-दहाड़े गिरा देना चाहिए जो शूद्रों की छाती पर बनें हैं?

यदि इसी इतिहासबोध से भारत का भविष्‍य तय होना है तो दलित-मूलनिवासियों को कमर कस लेनी चाहिए? फिर देखते हैं बुद्धिजीवी, मीडिया और मठाधीश क्‍या करते हैं? और अपनी राय तो कम-से-कम इस अशांत अस्‍मिता के बारे में स्‍पष्‍ट करनी ही चाहिए?

कुमार श्‍याम

2 Comments

  • Siddharth says:

    I think that is only appropriate that the Dalits now start asking that their own heritage should be taken back the same way. The problem is that the Dalit and Adwaasi are not united in the same way the upper caste do. Even after so many different castes they are untied under the umbrella of ‘General’. We on the other hand simply divided. We need a awakening. How Will that come, I have no idea.

  • Parveen Kumar says:

    very nice

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