भूख और बेबसी पर अट्टहास !

कोई दीया जलाए न जलाए यह महत्‍‍वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण है कि देश का नेतृत्व करने वाले प्रधान की मंशा क्या है? उनके भीतर क्या घटित हो रहा है? ताली-थाली और घंटी के बाद दीप प्रज्जवलन का उत्सव. चिकित्सकों का धन्यवाद ज्ञापित करने के बाद अब एकता का प्रमाण. आख़िर इन चीज़ों का फ़िलहाल कोई मूल्य है?
 
डॉक्टरों को घर से निकाला गया. उन्होंने हारकर गृहमंत्री को ख़त लिखा. उन्हें दौड़ाकर पीटा गया. उन्होंने अनेक बार सरकार से दरख़्वास्त की कि हमें सुरक्षा इंतज़ाम चाहिए. फिर भी वो अपनी ज़ान को ज़ाेखिम में डालकर मरीज़ों का इलाज़ करते रहे और अभी सरकार 90 टन के क़रीब चिकित्सा सुरक्षा के उपकरण सर्बिया को बेच दिए. किन्तु इन बिन्दुओं पर प्रधानसेवक एकबार भी न बोले? तो वो चिकित्सक कौन हैं जिनके लिए तालियां बजाईं. हालांकि इन चिकित्सकों के साथ तो प्रधान का कोई वास्ता नज़र नहीं आता.
 
अब दीप जलाओ. अंधकार काे मिटाने के लिए. एकता का उजाला करो. वाह! किसकी एकता? कौनसे 130 करोड़? मुझे तो नहीं लगता कि प्रधान की ज़बां 130 करोड़ के लिए कह रही थी. आप उनके शब्दों पर ग़ौर करें. शब्द ही व्यक्ति की आत्मा का दर्पण है. वो कहते हैं कि आप अपनी बालकनी और दरवाज़े पर खड़े हों. उनकी शब्दावली में कभी भी आंगन, मूंडेर या दलान नहीं आएगा. निश्चित ही वो उन्हें कह भी नहीं रहे. उनकी दृष्टि में केवल अघाया मध्यवर्गीय समुदाय है. जो इन दिनों में बेहद बोर हो चुका है. उसे कुछ टास्क चाहिए. मनोरंजन का कोई सबब.
 
देश में यह एक मध्यमवर्गीय समुदाय उपजा है, यह इतना निर्लज्ज और संवेदनहीन है कि इसके लिए देश के करोड़ों ग़रीब, आदिवासी और गांवों के लोग किड़े-मकोड़ों की तरह नज़र आते हैं. उन ग़रीबों की मुश्किलें इन लोगों के लिए आउट ऑव सलेबस है. उनकी भूख-प्यास से इनका कोई सम्बन्ध नहीं. अपने वातानुकुलित कमरे में बैठकर राक्षसों की तरह अट्टाहास करते हैं. ग़रीबी पर प्रहसन के आयोजन करते हैं. और प्रधान इनकी अय्याश भूख को तृप्त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. वो राष्ट्र को संबोधित करेंगे किन्तु उनका लक्ष्य सिर्फ़ वो ही लोग होंगे.
 
दिल्ली से बिहार की ओर लौटे अनेक ग़रीबों एवं मज़दूरों ने राह में चलते-चलते भूख और प्यास से दम तोड़ दिया. नन्हें बच्चे नंगे पांव अपनी डगर लौटने को बेताब दिखे. उनकी आंखों में पलायन का दर्द और भूख की चिंता थी. आज भी देश के करोड़ों लोग ऐसे हैं जो जिनका चूल्हा दिन की रोटी कमाकर ही जलता है. उनके पास कोई बैंक बैलेंश नहीं हैं. वो अपना गुजारा नहीं कर सकते.
 
किन्तु साहब एकता की परीक्षा लेना चाहते हैं. हम एक ही हैं साहब. महत्वपूर्ण है कि आप कब इस देश की समूची आबादी को एक कब समझोगे. हमें मालूम हैं कि आपके साथ टीवी चैनल्स हैं. उन्होंने दीप जलाने की मुहिम के लिए एड या प्रोमो बना लिए हैं. समूचे दिन बस यही चलेगा. आपको विश्व-नेता के रूप में दिखाएंगे. क्योंकि आपने उन पर अरबों-ख़रबों का निवेश किया है. तो यह हमें मालूम है. किन्तु आप एकबार अपनी आत्मा के झांककर तो देखें कि आख़िर क्यों कुछ अघाए घरों को ख़ुश करने के लिए करोड़ों लोगों की भूख और बेबसी पर उत्सव मनवाना चाहते हैं.
 
इटली की कॉपी कीजिए. किन्तु इस देश को तो समझो साहब.

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