बाबा रामदेव और विवाद पर ठहरकर विचार करने की ज़रूरत

इन दिनों बाबा रामदेव अपने बयानों को लेकर न केवल डॉक्‍टरों के निशाने पर है बल्‍कि सोशल मीडिया पर भी जमकर ट्रोल हो रहे हैं। बाबा रामदेव की नियमित रूप से कोई न कोई वीडियो क्‍लिप वायरल हो ही रही है जिसमें वो कुछ ऐसा कह जाते हैं, जिस पर फिर सुर्खिंया बनती है। टीवी पर बहसें आयोजित होती हैं।

इस बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता कि बाबा जी की एलोपैथी चिकित्‍सा को लेकर तीखी प्रतिक्रिया में उनके व्‍यवसायिक पहलू हैं और अपने निहित स्‍वार्थ भी हैं। फिर भी उनके सवालों को सिर्फ़ इस कारण से ही गंभीरता से न लेना उचित नहीं। चर्चा तो होनी ही चाहिए।

मैं यह भी जानता हूं कि सवाल पूछने और चुनौति देने की भी अनुकूल परिस्‍थितियां और उचित समय होता है। डॉक्‍टरों की मृत्‍युओं के आंकड़ों पर हंसकर बतियाना और फिर ठहका लगाकर सभा को संबोधित करना न तो आयुर्वेद की श्रेष्‍ठता का मानदंड है और न ही व्‍यवहारिक आचरण की सुंदरता। इसकी तो आलोचना की ही जानी चाहिए।

फ़ेसबुक और ट्वीटर पर बाबा रामदेव के प्रति कटुता और तीखी प्रतिक्रिया के अपने राजनीतिक कारण हैं। वो भली-बुरी कोई भी बात कह दें, उनको एक वर्ग की ओर से तल्‍ख़ी झेलनी पड़ेगी और एक तबका हमेशा की तरह चरण-वंदना में लहालोट होगा। इनसे इतर भी बात की जा सकती है। लेकिन होती नहीं है।

बाबा रामदेव से इन दिनों कुछ प्रश्‍न पूछे जा रहे हैं, वो उत्‍तर दिए जा रहे हैं लेकिन जहां पंद्रह से बीस सैकंड की क्लिप सुनकर ही सब तय कर लिया जाता है वहां उनकी पूरी बात सुनने का परिश्रम कौन करे?

कल आजतक पर अंजना ओम कश्‍यप के साथ कुछ डॉक्‍टर्स और बाबा रामदेव जुड़े थे बातचीत के लिए। उसमें बाबा रामदेव के कुछ स्‍पष्‍टीकरण थे –

  • वो एलोपैथी के विरोधी नहीं हैं। आधुनिक मेडिकल साइंस में हुए नवाचार के पक्षधर हैं। आपातकालीन उपचार में एलोपैथी बहुत आगे है।
  • होम्‍योपैथी यदि एलोपैथी की शक्‍ति और नवीन प्रयोगों को स्‍वीकारती और सराहती है तो एलोपैथी के मुंह से होम्‍योपैथी की गुणवत्‍ता के लिए कुछ मधुर क्‍यों नहीं निकलता?
  • हम यह नहीं कहते कि एलोपैथी को ख़ारिज़ करो। बल्‍कि जहां एलोपैथिक दवाएं निष्‍प्रभ हैं, वहां अगर होम्‍योपैथिक दवाएं उपयोग में लेकर जांचा जाए तो क्‍या हर्ज़ है? क्‍या इस आपातकाल में मिलकर काम नहीं कर सकते?

कुल मिलाकर यह बाबा रामदेव की बातचीत का लब्‍बोलुआब था।

बाबा पर तंज़ कसा जाता है कि उनके सहयोगी तो अपने इलाज़ के लिए एम्‍स में भर्ती होते हैं, बाबा क्‍यों नहीं इलाज़ कर देते? तिस पर वो कहते हैं कि आपातकालीन स्‍थिति में एलोपैथी ने बहुत काम किया है। जीवनरक्षा करती है। इसे वो नकारते नहीं हैं।मेरा कहना है कि इन तमाम पक्षों को जानकर ही मुद्दे को समझें और अपनी राय दें। बाबा जी एलोपैथी/होम्‍योपैथी की बात करें और हम पलटकर कह दें बाबा जी पहले पैंतीस रूपए प्रति लीटर पेट्रोल दिलवाओ? यह तो बहस का तरीक़ा नहीं। उस बयान की आलोचना होती है। मगर हर बात का एक जवाब नहीं हुआ करता।

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