तुम मत दुखी होओ. लेकिन जो दुःखी हैं, उन्हें आंसू बहाने दो.

मशहूर टीवी एंकर एवं पत्रकार रोहित सरदाना का आकस्‍मिक निधन के बाद मीडिया जगत में शोक की लहर है. रोहित महज़ 42 वर्ष के थे. हफ़्ते भर पहले ही कोरोना संक्रमित हुए थे. लगातार ट्वीटर पर सक्रिय थे. लोगों की मदद के ट्वीट्स कर रहे थे. सहयोगियों का कहना है कि वो कोरोना से उबर रहे थे. लेकिन अचानक हार्ट अटैक से उनकी मृत्‍यु हो गई.

रोहित सरदाना के निधन के बाद उपजे हालातों पर मैंने अनेक टिप्‍पणियां कीं. उन्हें सिलसिलेवार यहां लिख रहा हूं.    

वीडियो एडिट कर ट्वीटर खोला और स्तब्ध रह गया. मशहूर एंकर रोहित सरदाना के निधन की ख़बर. उफ्फ़! मैं रोहित को इंस्टाग्राम पर फॉलो करता रहा हूं. अपनी नन्हीं बेटियों की तस्वीरें और वीडियो डालते रहते हैं. उनके साथ चुहलबाज़ी, हॅंसी-मज़ाक और प्यार. सोचकर ही व्यथित हूं कि वो कैसे संभाल पा रहे होंगे ख़ुद को. बहुत क्रूर वक्त है. बेहद डरावना.

रोहित सरदाना से गहरे मतभेद रहे. उनके खिलाफ़ बहुत बोला. लेकिन पिछले चार बरसों में नियमित सुनता रहा. देखता रखा. हालांकि यह काम का हिस्सा था मगर एक रिश्ता बन गया था. लेकिन इस ख़बर ने झकझोर दिया है. श्रद्धांजलि.

सरदाना के निधन पर ‘ख़ुशी का इज़हार’ करते लोगों के लिए

मैं सोशल मीडिया पर आज गहरी नज़र बनाए हुए हूं. जो रोहित सरदाना के निधन पर हॅंस रहा है, स्माइली लगा रहा है या चुटकी ले रहा है, मैं उनसे अपने तमाम निजी रिश्ते समाप्त करूंगा. मुझे ऐसे निष्ठुर लोग नहीं चाहिए जो मृत्यु पर प्रहसन करें. वो इंसान नहीं हो सकते. ऐसे छुपे संवेदनहीन लोगों से कोई संबंध रखना भी, मेरे सामर्थ्य से बाहर की बात है.

मैं बेहद‌‌ नाज़ुक आदमी हूं. मुझसे यह सहा नहीं जाता.

जीवित रहते सौ‌ बार लड़ो, मगर जिसकी अभी तक चिता भी ठंडी न हुई हो, उस पर सार्वजनिक रूप से हैवानियत प्रदर्शित करे, असह्य है.

तुम मत दुखी होओ. लेकिन जो दुःखी हैं, उन्हें आंसू बहाने दो. उनको तो कम से कम शोक का अधिकार दो? आप‌ अपने घर में उत्सव का आयोजन कर सकते हो, अगर भीतर से मर चुके हो तो.

रोहित सरदाना से असहमतियों पर

बेशक आदमी जो करता है, उसी से जाना-पहचाना जाता है. लेकिन इस आकलन के लिए समय, परिस्थिति और देशकाल होता है. जिसकी अभी तक चिता भी ठंडी न हुई हो, वहां यह ज्ञान बघारना दुष्टता से अधिक कुछ नहीं है.

जो इस तर्क का बारम्बार उपयोग कर रहे हैं, उनका मन देखो, नीयत परखो.

उससे बड़ा फासिस्ट और कौन हो सकता है, जो अपने विरोधी की मौत तक को नहीं बख्शता. वैचारिक विरोध, मतभेद आदि तो बहुत दूर की चीजें हैं.

माफ़ करें, मैं ऐसा नहीं हो पाया. न हो सकता हूं.

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