नीम के पत्‍ते !

neem ke patte kumar shyam

मुहब्‍बत के शुरूआती दिनों का ग़वाह एक वृक्ष था। नीम का वृक्ष। जिप्‍सम के सख्‍़त सीने को चीरकर उगा था वोह हमारी मुहब्‍बत को छांव देने के लिए। पीले पर्ण। झुकी हुई देह का मालिक। बेहद विनम्र नीम।

उस दिन मौसम अपने साथ कुछ गुस्‍ताख़ियां लिए हुए था। कुछ शरारती हवाएं बार-बार उस वक्रदेही नीम को झिझोंड़ रही थीं। वह किसी बुजुर्ग की तरह बचकानी शरारत ज्‍यूं अनदेखी करता मुस्‍कुरा रहा था जैसे। पीले पर्ण झड़-झड़कर उसके प्रांगण को पीला कर रहे थे।

और उसके नीचे बैठी थी वोह। जैसे नीम उस पर पर्ण-वर्षा कर रहा हो कुछ घटने से पूर्व। वह सलौना मुख नीम के आशीर्वाद से अत्‍यंत तृप्‍त। उसके नेत्र बिल्‍कुल नीम की शाखाओं का अनुकरण करते प्रतीत हो रहे थे। कभी उठना फिर किसी सौम्‍य-सी लज्‍जा से झुक जाना।

नेत्रों का निमंत्रण था। मैं रफ़्ता-रफ़्ता ख़ुद में कुछ बटोरा। निकट जाकर उसके पास रक्‍खे किसी अनजान ख़ाली पृष्‍ठ पर लिख दिया कच्‍ची-पेन्सिल से-

‘आई लव यू’

उसका चेहरा पीले पर्ण-सा तब्‍दील हो गया। नेत्र नीम से विनम्र। और मौसम में अज़ब-सी गुस्‍ताख़ी बरक़रार।

मुझे लगा था कि मैंने कोई ग़लती कर दी। जिसका ग़वाह वोह नीम था।

फिर उसने किसी अनजाने श्‍वेत पृष्‍ठ पर पंक्तियों की भीड़ में मेरे हिस्‍से की पंक्ति को बड़े सलीक़े से लिख दिया था उद्धरण चिह्नों में-

‘’कोई ग़लती नहीं हुई!’’

आज वो नीम का वृक्ष तो नहीं लेकिन उसकी छांव, पत्‍तों और शाखाओं की मौज़ुदगी में हरी हुई मुहब्‍बत आज भी है। रहेगी उस तरह जिस तरह उसकी अथाह जड़ों के अंश शामिल है उस ज़मीन के एक-एक कण में।

4 Comments

  • Krishna says:

    Very instersting article

  • Shivam Tiwari says:

    आपकी रचनाओ में दर्द के आंसू भी है , और झरने की पहली बूंद की झुरझुरी भी। स्पष्ट शब्दों में भी गहराई का सुंदर चिंतन आपके लेखन की पहचान जान पड़ता है।
    हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है।
    हम अपनी लिखी ३ किताबे आपके साथ साझा करना चाहते है।
    अगर आप हमें अपना पता भेज दे तो हम उन्हें आप तक पहुंचा सके।
    हम बस ये समझे है कि आप से थोड़ा मिलता झूलता जीवन मेरा भी है पर बस फर्क इतना है आप पत्रकारिता चुन कर आगे बढ़ रहे हम engineering .

    Shivam Tiwari
    M.tech (CS&E)
    Amity University , Lucknow.

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