क्‍या विपक्ष द्वारा मीडिया का बहिष्‍कार करना सही है?

यह प्रश्न सभी के ख़्याल में होगा। इसके पीछे का द्वंद्व यह है कि यदि विपक्ष इस पागल हो चुकी मीडिया को तिलांजलि देता है तो वह वो माध्यम खो देता है जिसके ज़रिए वो जनता के समक्ष अपनी बात पहुंचा सकता है। अथवा विपक्ष अपने प्रवक्ताओं को टीवी पर भेजता है तो वहां सवाल सत्ता से नहीं बल्कि उन्हीं से ही पूछे जाएंगे। मीडिया भूखे शिकारी की तरह विपक्ष को ढाहने की जुगत में अहर्निश लगा रहता है।
 
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार और अभिसार शर्मा ने विपक्ष को नसीहत दी है कि वो यह ज़ोखिम ले ही लें कि अपने प्रवक्ताओं को टीवी डिबेट्स में न भेजें। उसके बाद लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने सार्वजनिक चिट्ठी लिखकर विपक्षी पार्टिंयों से दरख़्वास्त की है।
 
कुछ कह रहे हैं कि विपक्ष अपनी बात रखने की रही-सही ज़गह भी खो देगा? मेरा मानना है कि स्क्रीन पर विपक्ष के लिए ज़गह है कहां? सारे दिन विपक्ष के खिलाफ़ प्रोपेगेण्डा चलता है। डिबेट्स में विपक्षी पार्टियों के प्रवक्ता शिकार की भांति दुबके बैठे रहते हैं। कुछ बोलने की कोशिश करते हैं तो माइक की आवाज़ कम कर दी जाती है। यह एक तरह से इन प्रवक्ताओं के साथ प्रहसन रचा जाता है। इससे जनता में विपक्ष की छवि अपराधी के रूप में जाती है, भले ही उनका पक्ष कितना ही सुदृढ़ क्यों न हों?
 
लेकिन यहां थोड़ी सावधानी बरतते हुए कुछ चुनिंदा चैनल्स को बहिष्कृत किया जा सकता है। फिर बहिष्कार से घाटा क्या? प्रचार के लिए और अपनी बात रखने के लिए सोशल मीडिया बेहतर है, इन दंगाई चैनलों से तो।
 
बहिष्कार करने से टीवी चैनलों पर क्या फ़र्क पड़ेगा?
 
पहला असर तो यह पड़ेगा कि इन दंगाई एंकरों की टोन मंद्धम पड़ जाएगी, क्योंकि चिल्लाएंगे किस पर? तमाम डिबेट्स एकतरफ़ा हो जाएंगी। सब बोरिंग। कोई नहीं देखेगा। साप्ताहिक रैंटिंग वाले ट्वीट्स नहीं देखने को मिलेंगे। यदि कोई एंकर चाहेगा कि वो बिना बहस ही अपना कार्यक्रम चला सकता है रवीश कुमार और पुण्य प्रसुन वाजपेयी की तरह तो एंकरों को दिनभर मेहनत करनी पड़ेगी। आधे घण्टे बोलने के लिए कुछ जुटाना पड़ेगा। यह पक्का है कि ज़मीन पर रिपोर्टिंग के लिए जाएंगे नहीं। क्‍योंकि बाहर गर्मी ज्‍़यादा है। एसी नहीं। तो मान कर चलिए बेचारे एंकरों के तेवर ढीले पड़ जाएंगे।
 
वो तो रवीश ही है जो बीजेपी के बहिष्कार के बाद भी नौकरी सीरीज़ से लेकर अनेक उम्दा स्टोरिज़ चलाईं। लेकिन गोदी मीडिया के एंकरों को यह अभ्यास नहीं है।
 
मेरी बात उतनी सतही नहीं है। आज़मा कर देखें। मज़ा आएगा।

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