दिलीप सी मंडल का सफाई अभियान कितना सही?

इन दिनों पत्रकार दिलीप सी मंडल फ़ेसबुक व ट्वीटर पर सफाई अभियान चलाए हुए हैं। अभिनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं अन्‍य क्षेत्रों से जुड़े लोगों के बरसों पहले किए ट्वीट्स जो कि जातिवादी हों या उस विचार को पोषित करने वाले हों, को खोजकर सोशल मीडिया पर चस्‍पा कर रहे हैं और उन लोगों की मानसिकता को बेनक़ाब कर रहे हैं।

कुछ लोग बेशर्त उन ट्वीट्स के लिए माफ़ी मांग रहे हैं। कुछ अफ़सोस ज़ाहिर कर रहे हैं और अपने अतीत में प्रकट किए विचारों के प्रति शर्मिंदा हैं।

इसके बावज़ूद उनके वर्तमान का मूल्‍यांकन बरसों पहले कही बातों के हिसाब से करना न केवल बचकानी हरकत है बल्‍कि मूर्खतापूर्ण भी है। हां, कोई व्‍यक्‍ति अपने जातिवादी विचार के साथ आज भी कायम है, तब आलोचना की जा सकती है। जो अफ़सोस ज़ाहिर कर रहा है और अपनी अज्ञानता पर शर्मिंदा है, उसको मानसिक प्रताड़ना देना उचित नहीं।

किसी भी व्‍यक्‍ति के व्‍यक्‍तित्‍व का निर्धारण वर्तमान चिंतन, विचार और कर्म से किया जाना ही न्‍यायसंगत है। दस बरस पहले वो क्‍या सोचता था और आज कितना बदलाव आया है, यह विकासक्रम का अंग है। यही विचार प्रक्रिया है। अगर मुझसे पूछे कि आप अपने अतीत के विचारों के साथ जाने जाएं या वर्तमान विचारों के साथ तो मैं अपने मूल्‍यांकन के लिए वर्तमान विचार ही आधारभूत मानूंगा।

मनुष्‍य का जीवन रफ़ कॉपी की मानिंद है। मनुष्‍य उसमें जीवनभर जोड़-घटाव, काटा-छांटी एवं लिखता-मिटाता रहता है। लेकिन उस कॉपी को आधारभूत नहीं मानता। जांच तो वो सफ़ कॉपी ही करवाता है। दिलीप सी मंडल और उनके पत्रकार साथियों को सफ़-कॉपी को जांचना चाहिए। उसी के आधार पर सहमति या असहमति रखनी चाहिए।

मैं अपने पुराने वीडियो देखता हूं और आज जब ख़ुद को देखता हूं तो बहुत बदला हुआ पाता हूं। अगर मैं ख़ुद सामने आकर कहूं कि तीन बरस पहले कही बातों से मैं ख़ुद, ख़ुद से सहमत नहीं तो इसमें कोई आश्‍चर्य की बात नहीं। यही जीवन है। यही जीवन की सुंदरता। कोई इतना महान कैसे हो सकता है कि वो मां की कोख से ही महानता के साथ अवतरित हुआ हो, उसे सब पता है, कोई बदलाव की गुंज़ाइश नहीं। यह जड़ता भी ठीक नहीं।

इसलिए कहा जा सकता है कि मनुष्‍य न केवल शारीरिक रूप से हर पल बदलता है, वैचारिक स्‍तर पर भी बदलाव की आंधी चलती रहती है। मैं उन महान लोगों के बारे में कुछ नहीं कह सकता जिन्‍होंने बरसों पहले ही समूचा अध्‍ययन कर लिया, दुनिया परख ली और एक विचार पर अडीग हैं। वहां से टस से मस नहीं हो रहे। हर कोई उतना मेधावी नहीं होता। न सवर्ण, न दलित।

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