नक्‍सलवाद : इतिहास, समस्‍या और समाधान

why is naxalism on the rise

असली समस्या अमीरी की बेतरतीब भूख है। एक तरफ आदिवासी लोग भुखमरी के शिकार हो रहे है तो दूसरी तरफ उद्योगपत्ति 5000 करोड़ का निजी बंगला बना रहे है। एक सीमा तक तो असमानता ठीक होती है लेकिन अगर यही गरीबी व अमीरी का अंतर लगातार बढ़ता जाए जिसके परिणामस्वरूप ग़रीब मूलभूत समस्याओं से ही वंचित हो जाए और अमीरी लोकतान्त्रिक सरकार को पंजे में जकड़कर अपने हिसाब से लूट का माध्यम ही बना डाले तो समस्या बढ़ती जाती है। जो भी दिल्ली में बैठी सरकारों ने विभिन्न योजनाओं के तहत धन भेजा वो स्थानीय नेताओं, अफसरों व जनप्रतिनिधियों ने मिलकर लूट लिया। ज़मीनों के बदले मुआवज़े देने के रजिस्टरों में अंगूठे करवा लिए और कभी मुआवज़ा मिला ही नहीं। पीड़ित लोग दारोगा के पास गए तो मारकर भगा दिया गया।

नक्‍सलवाद : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य

  • प्रेमसिंह सियाग

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के छोटे से गाँव नक्सलवाड़ी-बेरुबाड़ी में भूमिहीन दलितों व खेतिहर मजदूरों ने जमींदारों के ख़िलाफ़ आंदोलन की शुरुआत की थी। जमींदार द्वारा छीनी गई ज़मीन को न्यायालय द्वारा मुक्त करने के आदेश को जब युवा दलित लेकर अपने गाँव गया तो जमींदार ने उसकी पिटाई कर दी। गाँव के लोगों ने इकट्ठे होकर जमींदार को पीट दिया। पुलिस आई तो पुलिस पर हमला कर दिया। चारु मजूमदार, कान्हू सान्याल, जंगल संथाल के नेतृत्व में दलितों व खेतिहर मजदूरों ने जमींदारों के ख़िलाफ़ हथियार उठा लिए। भूमि सुधार की जो बातें सरकार ने की थी वो लागु नहीं हुई और निराश लोग इस आंदोलन में शामिल होते गए और इसी को मुक्ति का मार्ग मान लिया। देखते ही देखते पूरा पश्चिम बंगाल इसकी चपेट में आ गया। यह नक्सलवाड़ी आंदोलन का पहला चरण था जिसमे भूमिहीन दलित व खेतिहर मजदुर शामिल थे।

ऐसा ही एक भूमिहीन किसानों का आंदोलन देश की आज़ादी के साथ ही आँध्रप्रदेश में शुरू हो गया था। किसान चाहते थे कि सिर्फ तेलुगु भाषी किसानों का एक अलग प्रदेश बने लेकिन श्री रामुलु की अनशन से मौत के बाद आनन-फानन में सरकार ने आँध्रप्रदेश बना दिया लेकिन उनकी मांग अब जाकर तेलंगाना के रूप में पूरी हुई है। सत्ता की लेट लतीफी व अनिर्णय की अवस्था ने नक्सलवाड़ी आंदोलन को आँध्रप्रदेश में फैलने का मौका दिया। दोनों किसान आंदोलन के मिलने से हालात भयंकर होते गए लेकिन तत्कालीन सरकारों ने भूमि सुधार को ठीक से लागू करने के बजाय बल प्रयोग से दमन करने की भारी भूल की थी।

सरकार को 13 जनवरी 1784 की घटना से सबक लेना चाहिए था जब तिलका मांझी ने भागलपुर के कलेक्टर की तीर मारकर हत्या कर दी व उसके बाद अंग्रेज सेना ने आदिवासियों का दमन करना चाहा लेकिन संथाल हूल, कोल विद्रोह, बिरसा उलगुलान रूपी विद्रोहों की झड़ी लग गई। आदिवासी लोगों का कहना था कि जब जंगल जमीन हमे भगवान ने दिए है तो राजस्व वसूलने वाले तुम कौन होते हो? आखिर अंग्रेजी सरकार को हार मानकर आदिवासियों के लिए अलग कानून पास करना पड़ा। आजादी के बाद से भारतीय सरकार प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने के लिए आगे बढ़ी। आदिवासियों के लिए कानून बनाये। उनकी जमीन को कोई खरीद नहीं सकता। जंगल व ज़मीन पर आदिवासियों का हक बताने वाले कानून पास किये लेकिन सभी क़ानून काग़ज़ों में समेटकर रख दिए। आदिवासियों की ज़मीनें बिना बेहतर पुनर्वास की व्यवस्था किये छीनी गई। ज़मीनों से बेदखल, बेबस, लाचार लोगों के लिए कोई भी योजना धरातल पर नहीं पहुंची।

समस्‍या क्‍या है?

उधर नक्सलबाड़ी का किसान आंदोलन राह भटककर नेताओं द्वारा रंगदारी-हफ्तावसूली के स्तर पर आ चुका था। उनको विस्तार के लिए शोषित लोग चाहिए थे। उन्होंने लूट के शिकार आदिवासी लोगों पर डोरे डालने शुरू किये और प्रचुर मात्रा में सफलता भी हासिल की। जब पीड़ित आदिवासी लोग नक्सलवाद से जुड़ने लगे तो यह भटका हुआ आंदोलन लाल डोरे के रूप में 12 राज्यों के लगभग 200 जिलों तक फैल गया। भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, बेईमान उद्योगपत्तियों व राह भटक चुके जन प्रतिनिधियों की संपदा की असीमित भूख ने किसानों-आदिवासियों को नक्सलवादियों के साथ जुड़ने के लिए मज़बूर कर दिया। मैं मानता हूँ कि देश के ख़िलाफ़ हथियार उठाना जायज़ नहीं है लेकिन नक्सलवाद की मूल जड़ असमानता है, जिसका उन्मूलन कौन करेगा? भूमि सुधार की नाकामियों से पीड़ित लोगों व आदिवासियों के उजड़े हुए घरों की जिम्मेदारी कौन लेगा? गरीबों के दमन से कभी समस्या का समाधान नहीं होता।

असली समस्या अमीरी की बेतरतीब भूख है। एक तरफ आदिवासी लोग भुखमरी के शिकार हो रहे है तो दूसरी तरफ उद्योगपत्ति 5000 करोड़ का निजी बंगला बना रहे है। एक सीमा तक तो असमानता ठीक होती है लेकिन अगर यही गरीबी व अमीरी का अंतर लगातार बढ़ता जाए जिसके परिणामस्वरूप ग़रीब मूलभूत समस्याओं से ही वंचित हो जाए और अमीरी लोकतान्त्रिक सरकार को पंजे में जकड़कर अपने हिसाब से लूट का माध्यम ही बना डाले तो समस्या बढ़ती जाती है। जो भी दिल्ली में बैठी सरकारों ने विभिन्न योजनाओं के तहत धन भेजा वो स्थानीय नेताओं, अफसरों व जनप्रतिनिधियों ने मिलकर लूट लिया। ज़मीनों के बदले मुआवज़े देने के रजिस्टरों में अंगूठे करवा लिए और कभी मुआवज़ा मिला ही नहीं। पीड़ित लोग दारोगा के पास गए तो मारकर भगा दिया गया।

सरकार का जनता से कोई संपर्क ही नहीं है। इन सब हालातों का फ़ायदा रंगदारी करने वाले नक्सली नेताओं ने उठाया। लाचार-बेबस लोगों को सपने दिखाकर बन्दूक थमा दी। आदिवासी लोग सरकारी व्यवस्था से ख़ौफ़ज़दा हैं। सरकारों का ट्रैक रिकॉर्ड उनको नक्सलियों के साथ खड़ा होने को मजबूर कर रहा है। सरकार में बैठे लोग अपनी पसंदीदा कंपनियों को सस्ते में खदानों के लिए ज़मीन दे रही है। कंपनियां कुछ पैसे स्थानीय प्रशासन के ऊपर उड़ा देती है व कुछ पैसे रंगदारी के रूप में नक्सली नेताओं को बाँट देती है। नक्सली लोगों को आंदोलन में जोड़ने के लिए ट्रेनिंग देने के लिए आँध्रप्रदेश व बंगाल के कमांडर आते है। ये कमांडर लोग पीछे रहते है व स्थानीय आदिवासी लोगों का उपयोग सुरक्षा बलों पर हमले करने के लिए करते हैं। इन नक्सली नेताओं की हवस की भूख मिटाने के लिए अपने ही गाँवों की बहन-बेटियों की अस्मत लुटाते हैं। ऐसे आरोप सुरक्षाबलों के जवानों पर भी लगते रहे हैं।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कहीं भी ऐसी चर्चाओं में किसानों व आदिवासियों की बात तक नहीं होती जबकि नक्सलबाड़ी आंदोलन की मूल भावना में भूमिहीन किसान व आदिवासी लोग ही रहे है। जब मुख्य मुद्दों व समस्याओं को नजरअंदाज़ करके सिर्फ नक्सली आतंक पर चर्चा होगी तो पीड़ितों-शोषितों की समस्या का निदान कौन करेगा? इन लोगों के अंदर सरकार के प्रति भरोसा कैसे पैदा होगा व हथियार उठाने की रफ़्तार को कौन रोकेगा? आज हालात यह हो रहे है कि दिल्ली, हरियाणा, पंजाब तक में घुसपैठ करने व युवाओं को जोड़ने में ये लोग सफल हो रहे है व बाकी राज्यों के युवा भी आदिवासी लोगों की वेदना के प्रति सहानुभूति दिखा रहे हैं। इस सहानुभूति का उपयोग नक्सली नेता अपने हिसाब से न कर ले इस पर सरकारों को ध्यान देना चाहिए। सरकारों की संवेदनहीनता के कारण देशभर से मायूस लोग बगावत का झंडा बुलंद कर रहे हैं। डर इस बात का है कि जगह-जगह के बगावती सुर कहीं नक्सलवादी नेताओं के सुर में जाकर न मिल जाए।

नक्‍सलवाद का समाधान

वर्तमान सरकार को समस्या किसानों व आदिवासियों की मानकर समाधान खोजना होगा। समस्या नक्सलवाद नहीं बल्कि समस्या शोषण व असमानता की मोटी खाई है। अगर समस्या की असली जड़ पर चोट करनी है तो बंगाल व आंध्रा में बैठे नक्सली नेताओं का इलाज़ करना होगा, कौड़ियों के भाव जमीनें खरीदकर प्रशासनिक अधिकारियों व नक्सली नेताओं को रंगदारी देने वाली कंपनियों का इलाज करना होगा। सरपंच व प्रधान चुनने के बजाय हर गाँव में 10-10 स्थानीय लोगों की कमेटी बनानी चाहिए। भ्रष्टाचार में लिपटे अधिकारियों को दण्डित करना व इस तरह के अधिकारियों को आदिवासी इलाकों से हटाना होगा। ईमानदारी के साथ आदिवासी क़ानूनों को लागू करना होगा। किसानों व आदिवासी लोगों की समस्याओं का त्वरित समाधान करना होगा। विचारों से पैदा हुई क्रांति को विचारों की प्रतिक्रांति से ही ख़त्म किया जा सकता है। बल प्रयोग से दमन करने की ग़लतफ़हमी से बाहर आना होगा। सिर्फ सड़क बनाकर विकास का ढींढोरा पीटने के बजाए वनोपज को आदिवासी लोगों की कमाई का बेहतर ज़रिया बनाना चाहिए। अरबों रुपये के तेंदुपत्तों के व्यापार में बिचौलियों, अफसरों को मालामाल करने की रणनीति पर रोक लगानी होगी। आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने की बात करके उनकी परंपराओं व रहन-सहन के तौर-तरीकों को बदनाम करना बंद करना होगा। उनको असभ्य-गँवार बताकर ज़लील नहीं करना चाहिए। देश में आदिवासियों के संवैधानिक, क़ानूनी व पारंपरिक अधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ है। ईमानदारी के साथ इन लोगों के अधिकारों की सुरक्षा करो!

कल हुए नक्सली हमले में 23 से ज्यादा जवानों की मौत हो गई व 21 ज़वान लापता बताए जा रहे हैं। कड़ी निंदा, हाई लेवल मीटिंग, ख़ात्मे के दावों व प्रतिदावों से बाहर आकर हकीक़त के परदे पर निर्णयों की कलम चलाना शुरू करोगे तो ही कुछ हो पाएगा। नक्सलवाद पूर्णतया सरकारों की नाकामियों का ऐसा ढींढोरा है जिसकी गूंज रोज इंटरनेशनल स्तर पर सुनाई देती है। सरकार प्रायोजित मानवता का ऐसा क़त्ल है जिसे कोई भी सभ्य समाज स्वीकार नहीं करता। सरकारों का नेतृत्व कर रहे लोगों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि हर मौत से पल्ला झाड़ने से समस्याएं और बढ़ती जाती हैं। नोटबन्दी के समय कहा गया कि इससे नक्सलवाद खत्म हो जाएगा लेकिन कुछ समय पहले राजस्थान के आदिवासी इलाकों में बवाल खड़ा हुआ तो कहा गया कि नक्सलवाद फैल रहा है। पिछले चार महीने से किसान आंदोलन चल रहा है। किसानों की मांगों का सहानुभुतिपूर्वक समाधान निकालने के बजाए उल्टा दमन किया जा रहा है। विभिन्न नामों/अलंकारों से अपमानित किया जा रहा है, धार्मिक गुंडों के माध्यम से हिंसा के लिए उकसाया जा रहा है। एक तिहाई भारत के किसान-आदिवासी पहले ही हिंसा में झुलस रहे हैं। किसानों, आदिवासियों व सुरक्षा बलों की मौतों का सिलसिला रुकना चाहिए। शहीद हुए जवानों को नमन करता हूँ।




कुमार श्‍याम डॉट इन हर पक्ष के विचारों और नज़रिए को अपने यहां समाहित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह आवश्‍यक नहीं है कि हम यहां प्रकाशित सभी विचारों से सहमत भी हों। लेकिन ऐसे स्वतंत्र लेखक और स्तंभकार जो कुमार श्‍याम डॉट इन पर लिखते हैं, हम उनके विचारों को मंच देते हैं लेकिन ज़वाबदेह नहीं हैं।

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