‘अगर आज भगत सिंह होते तो वो ज़ेल में होते’

  • कृष्ण जांगिड़

भगत सिंह के विचार, उनका किरदार पूंजीवादी और दक्षिणपंथी राजनीति के धुर विरोधी हैं। लेकिन तमाम तरह की वैचारिक मतभिन्नता होते हुए भी दक्षिणपंथी भाजपा/आरएसएस और इनसे सम्बंधित संगठन शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह को स्वीकारने, उन्हें मानने के लिए बाध्य हैं। इसके पीछे दो कारण मुख्यतः नज़र आते हैं-

पहला; यह भगत सिंह के व्यक्तित्व की विशालता है, उनकी प्रासंगिकता है, देश की ख़ातिर उनकी कुर्बानी और उसके पक्ष में विराट जनस्वीकार्यता है। जिसे किसी प्रचार के बूते झुठलाना हरगिज़ मुमकिन नहीं। भगत सिंह के मायने देशप्रेम के लिए समर्पित तरुणाई से है। ऐसे में अगर अपने वोट और समर्थन को बचाए रखना है तो लाख मतभेदों के बावजूद भगत सिंह की प्रासंगिकता को स्वीकार करना दक्षिणपंथियों की स्वाभाविक मजबूरी है।

दूसरा; नए-नए दक्षिणपंथी नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने भगत सिंह को पढ़ा बहुत कम है। जिसके चलते भगत सिंह इन्हें महज़ बन्दूक और बम चलाने वाला जोशीला क्रांतिकारी ही लगता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। वरना आप सोचकर देखिए कि सरकारों के पिट्ठू बने लोग भी सोशल मीडिया पर ”मैं फैन भगत सिंह का” लिख लेते हैं। किस बात का फैन भई? क्या भगत सिंह की तरह कुव्वत है गलत का विरोध करने की? या कम से कम सच और हक़ की बात रखने की? नहीं तो फिर ये नासमझी और ढोंग क्यों?

बिना वैचारिक आधार के कोई तार्किक आदमी किसी विश्वास या मान्यता को बल नहीं देता। ऐसे में एक तो भगत सिंह की बातों, सोच, उनके विचारों को दक्षिणपंथियों ने अच्छे से पढ़ा नहीं, ग़र पढ़ भी लिया तो वे विचार इनकी समझ से बाहर हैं। अक्सर ही दिखाई देता है कि सत्ता पक्ष से सटे लोग भी ”इंक़लाब ज़िंदाबाद” का नारा लगा बैठते हैं। लगता है कि मज़ाक चल रहा है उन मतवालों की विरासत के साथ। इंक़लाब ज़िंदाबाद का मतलब होता है ‘क्रांति की जय’ और ये नारा स्थापित सत्ता/व्यवस्था के विरोध में उसे उखाड़ने की मंशा से लगाया जाता है। आप भगत सिंह को देखिए, उनके साथियों को देखिए। ये नारा कभी औपनिवेशिक शासन के चाटुकारों द्वारा तो नहीं लगाया गया था।

दक्षिणपंथियों द्वारा भगत सिंह को मानने का एक और प्रबल कारण यह भी है कि भगत सिंह की आड़ में इन्हें गांधी और नेहरू की आलोचना करने का तरीका आता है। इस तरह यह गांधी-नेहरू की विरासत को मिटाने और भगत सिंह के समाजवाद को धुंधलका कर देने का सम्मिलित प्रयास सा है।

ऊपर लिखित ये बातें महज़ कोरे दावे नहीं है। भगत सिंह को अच्छे से पढ़िए, उनके विचारों को समझिए, मनन कीजिए। सब समझ आ जाएगा। भगत सिंह घोर वैचारिक, सैद्धांतिक और तार्किक व्यक्ति थे। 23 साल का वह युवा किसी बुद्धिजीवी और पके हुए अध्येता से कम नहीं था। भगत सिंह की अमर शख्सियत से जुड़ी निम्न बातों को पढ़िए। भगत सिंह के विचारों से पूंजीवादी तथा दक्षिणपंथी सोच में निहित असमानता आप आसानी से समझ जाएंगे।


• जिस दौर में दक्षिणपथी राजनेता जेल जाने से बचा करते थे, भगत सिंह ने हँसते हुए फांसी का फंदा चूम लिया था।
• भगत सिंह साम्प्रदायिकता और अतिवादी धार्मिक उन्माद के ख़िलाफ़ थे।
• भगत सिंह हिन्दू या मुस्लिम राष्ट्र की संकल्पना के पूरी तरह ख़िलाफ़ थे।
• भगत सिंह साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विरोधी थे।
• भगत सिंह प्रगतिशील समाजवादी विचारों में विश्वास रखते थे। उन्होंने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का नाम बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) रखा था।
• भगत सिंह मजदूर, किसान और छात्रों के पक्ष में तथा औपनिवेशिक शासक वर्ग के विरोध में मजबूती से खड़े थे।
• 23 साल की उम्र तक भगत सिंह ने सैंकड़ो किताबें पढ़ डाली थी। वे मार्क्स, लेनिन, गैरीबाल्डी से प्रभावित थे।
• भगत सिंह ईश्वरीय सत्ता के उपासक नहीं थे, नास्तिक थे।
• नेहरू और बोस जैसे पक्के वामपंथियों के प्रशंसक थे।
• भगत सिंह व्यवस्था परिवर्तन की बात करते थे। शोषित तबके को उसका हक़/अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध थे।
• भगत सिंह ऐसा समाज चाहते थे जहाँ गरीब या कमज़ोर के हिस्से की हकमारी न हो। समानता, स्वाधीनता और जनवाद भगत सिंह चाहते थे।
• भगत सिंह हमेशा ही विद्यार्थी वर्ग को देश और समाज के लिए सोचने तथा राजनीति में भागीदारी के पक्षधर रहे।

भगत सिंह इस दौर में होते तो आज के हुक़्मरान उन्हें जेलखाने से बाहर न रखते और सरकार के अंधे समर्थक उन्हें देशद्रोही करार कर तालियां पीटते रहते। सोशल मीडिया से लेकर हर जगह शासन का चाटुकार तबका उनके ख़िलाफ़ खड़ा होता। बावजूद भगत सिंह डटे होते, मजबूती से अपने देशवासियों के लिए अड़े होते।

भगत सिंह का मानना था कि पिस्तौल और बम इंक़लाब नहीं लाते, बल्कि इंक़लाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। देश की नौजवान पीढ़ी को शिक्षित, जागरुक और वैचारिक मजबूत बनाकर बेहतरीन व्यवस्था का ख्वाब संजोए नौजवान भगत सिंह छोटी उम्र में देश के लिए न्यौछावर हो गए। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि भगत सिंह जैसा इंक़लाबी कुछ और बरस मुल्क़ की खातिर जी नहीं सका। शोषण मुक्त समाज का उनका सपना आज भी अधूरा है।


”हवाओ में रहेगी मेरे ख़यालों की बिजली!! ये मुश्त-ए-खाक़ है फानी रहे ना रहे!!”

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